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वैराग्य संदीपनी • अध्याय 1 • श्लोक 47
तुलसी ऐसे सीतल संता । सदा रहै एहि भाँति एकंता ॥ कहा करै खल लोग भुजंगा । कीन्ह्यौ गरल-सील जो अंगा ॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसे शीतल (शान्त) संत सदा इसी प्रकार एकान्त में (केवल एक शान्तिपद रूप परमात्मा के परमपद में) ही निवास करते हैं। जिन्होंने अपने अज्ञों को विषस्वभाव बना लिया है, ऐसे सर्परूप दुष्ट लोग उन (संतों) का क्या ( बिगाड़) कर सकते हैं।
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