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वैराग्य संदीपनी • अध्याय 1 • श्लोक 46
बिबिध पाप संभव जो तापा । मिटहिं दोष दुख दुसह कलापा ॥ परम सांति सुख रहै समाई । तहँ उतपात न बेधै आई ॥
विविध पापों से उत्पन्न जो ताप (कष्ट) हैं तथा जो दोष एवं असह्य दुःखसमूह हैं, वे मिट जाते हैं और वह उस परमशान्ति रूप सुख में समा जाता है कि जहाँ कोई भी उत्पात आकर प्रवेश नहीं कर सकता।
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