बिबिध पाप संभव जो तापा ।
मिटहिं दोष दुख दुसह कलापा ॥
परम सांति सुख रहै समाई ।
तहँ उतपात न बेधै आई ॥
विविध पापों से उत्पन्न जो ताप (कष्ट) हैं तथा जो दोष एवं असह्य दुःखसमूह हैं, वे मिट जाते हैं और वह उस परमशान्ति रूप सुख में समा जाता है कि जहाँ कोई भी उत्पात आकर प्रवेश नहीं कर सकता।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वैराग्य संदीपनी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
वैराग्य संदीपनी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।