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वैराग्य संदीपनी • अध्याय 1 • श्लोक 45
चौपाई – अमल अदाग शांतिपद सारा । सकल कलेस न करत प्रहारा ॥ तुलसी उर धारै जो कोई । रहै अनंद सिंधु महँ सोई ॥
यह निर्मल और निष्कलङ्क शान्तिपद ही सार (तत्त्व) है। (इसकी प्राप्ति होने पर) कोई भी क्लेश प्रहार (आक्रमण) नहीं करते (अर्थात्‌ इस स्थिति में समस्त अविद्याजनित क्लेशों का नाश हो जाता है)। तुलसीदासजी कहते हैं जो कोई इसे हृदय में धारण कर लेता है, वह आनन्दसागर में निमग्न रहता है।
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