दोहा –
दास रता एक नाम सों उभय लोक सुख त्यागि ।
तुलसी न्यारो ह्वै रहै दहै न दुख की आगि ॥
भगवान् का सेवक दोनों (पृथ्वी और स्वर्ग) लोकों का सुख त्यागकर एक मात्र भगवान् के नाम में ही प्रेम करता है। तुलसीदासजी कहते हैं कि वह संसार से अलग होकर (संसार की आसक्ति को छोड़कर) रहता है, इसलिये दुःखकी अग्नि में नहीं जलता।
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