चौपाई –
जदपि साधु सबही बिधि हीना ।
तद्यपि समता के न कुलीना ॥
यह दिन रैन नाम उच्चरै ।
वह नित मान अगिनि महँ जरै ॥
साधु यदि सभी प्रकार से हीन भी हो तो भी कुलीन (ऊँचे कुल वाले) की उसके साथ समता नहीं हो सकती; क्योंकि यह (साथु) दिन- रात भगवान् के नाम का उच्चारण करता है और वह (कुलीन) नित्य अभिमान की अग्नि में जला करता है।
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