तुलसीदासजी कहते हैं कि (संत की महिमा इतनी अपार है कि) पृथ्वी को कागज, समुद्र को दावात और कल्पवृक्ष कों कलम बनाकर भी, गणेशजी से भी उसकी महिमा नहीं लिखी जा सकती।
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