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वैराग्य संदीपनी • अध्याय 1 • श्लोक 34
सोरठा – को बरनै मुख एक तुलसी महिमा संत की । जिन्ह के बिमल बिबेक सेस महेस न कहि सकत ॥
तुलसीदासंजी कहते हैं कि एक मुख से संत की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है। जिनके मलरहित (मायारहित विशुद्ध) विवेक है, वे (सहस्नमुखवाले) शेषजी और (पद्ञमुख) महेश्वर (शिवजी) भी उसका कथन नहीं कर सकते।
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