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वैराग्य संदीपनी • अध्याय 1 • श्लोक 33
मैं तं मेट्यो मोह तम उग्यो आतमा भानु । संत राज सो जानिये तुलसी या सहिदानु ॥
जिसके आत्मारूपी सूर्य का उदय हो गया और मैं-तू-रूप अज्ञान के अंधकार का नाश हो गया, तुलसीदासजी कहते हैं कि उसको संतराज (संतशिरोमणि) जानना चाहिये; क्योंकि यही उसकी पहिचान है।
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