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वैराग्य संदीपनी • अध्याय 1 • श्लोक 32
बिरले बिरले पाइए माया त्यागी संत । तुलसी कामी कुटिल कलि केकी केक अनंत ॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि कलियुग में माया का त्याग कर देने वाले संत कोई-कोई ही मिलते हैं, पर (ऊपर से मीठा बोलने वाले और मौका लगते ही साँपों कों खा जाने वाले) मोर-मोरिनी-जैसे कामी-कुटिल लोगों का अन्त (पार) नहीं हैं।
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