सम कंचन काँचै गिनत सत्रु मित्र सम दोइ ।
तुलसी या संसारमें कात संत जन सोई ॥
जो सोने और काँच को समान समझता है, जिसको शत्रु-मित्र दोनों समान हैं – तुलसीदासजी कहते हैं कि इस संसार में उसी को संतजन कहते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वैराग्य संदीपनी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
वैराग्य संदीपनी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।