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वैराग्य संदीपनी • अध्याय 1 • श्लोक 30
अहंबाद मैं तैं नहीं दुष्ट संग नहिं कोइ । दुख ते दुख नहिं ऊपजै सुख तैं सुख नहिं होइ ॥
जिसमें न तो अहंकार है, न मैं-तू (या मेरा-तेरा) है, जिसके कोई भी दुष्ट संग नहीं है, जिसको दुःख (दुःखजनक घटना) से दुःख नहीं होता तथा सुख से हर्ष नहीं होता।
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