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वैराग्य संदीपनी • अध्याय 1 • श्लोक 29
दोहा – आकिंचन इंद्रीदमन रमन राम इक तार । तुलसी ऐसे संत जन बिरले या संसार ॥
जो अकिञ्चन हैं (जिनके पास ममता की कोई भी वस्तु नहीं है), जो इन्द्रियों का दमन किये हुए हैं और जो एकतार (निरन्तर) राम में ही रमण करते हैं, तुलसीदासजी कहते हैं ऐसे संतजन इस संसार में बिरले ही हैं।
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