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वैराग्य संदीपनी • अध्याय 1 • श्लोक 28
चौपाई – कंचन को मृतिका करि मानत । कामिनि काष्ठ सिला पहिचानत ॥ तुलसी भूलि गयो रस एह । ते जन प्रगट राम की देहा ॥
जो सोने को मिट्टी के समान मानते हैं और स्त्री को काठ-पत्थर के रूप में देखते हैं, तुलसीदासजी कहते हैं कि जो इस (विषय) रस को भूल गये हैं, वे (संत) जन श्रीरामचन्द्रजी के मूर्तिमान्‌ शरीर ही हैं।
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