मुख दीखत पातक हरै परसत कर्म बिलाहिं ।
बचन सुनत मन मोहगत पूरुब भाग मिलाहिं ॥
जिनका मुख दीखते ही पाप नष्ट हो जाते हैं, स्पर्श होते ही कर्म विलीन हो जाते हैं और बचन सुनते ही मनका मोह (अज्ञान) चला जाता है, ऐसे संत पूर्व (जन्मकृत कर्मो के कारण) सद्भाग्य से ही मिलते हैं।
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