अनुभव सुख उतपति करत भय-भ्रम धरै उठाइ ।
ऐसी बानी संत की जो उर भेदै आइ ॥
संत की वाणी ऐसी होती है कि जो अनुभव-सुख-(आत्मानुभूति के आनन्द) को उत्पन्न करती है, भय और भ्रम को उठाकर अलग रख देती है और आकर हृदय को भेद डालती (हृदय की अज्ञान ग्रन्थि को तोड़ डालती) है।
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