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वैराग्य संदीपनी • अध्याय 1 • श्लोक 2
तुलसी मिटै न मोह तम किएँ कोटि गुन ग्राम । हृदय कमल फूलै नहीं बिनु रबि-कुल-रबि राम ॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि सूर्यकुल के सूर्य श्रीरामजी के बिना करोड़ों गुणसमूहों का सम्पादन करने पर भी अज्ञान का अन्धकार नहीं मिटता और न हृदयकमल ही प्रफुल्लित होता है।
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