चौपाई –
अति अनन्यगति इंद्री जीता ।
जाको हरि बिनु कतहुँ न चीता ॥
मृग तृष्णा सम जग जिय जानी ।
तुलसी ताहि संत पहिचानी ॥
जो सर्वथा अनन्यगति हों अर्थात् भगवान् के सिवा अन्य किसी को भी इष्ट मानकर न भजता हो, इन्द्रियों पर विजय प्राप्त किये हुए हो, जिसका चित्त श्रीहरि को छोड़कर कहीं भी न लगता हो और जो जगत् को अपने जी में मृगतृष्णा के समान मिथ्या जानता हो, तुलसीदासजी कहते हैं कि उसी को संत समझो।
(सूर्य की किरणों के पड़ने से बालू में जल प्रतीत होता है, परंतु वस्तुत: वहाँ जल नहीं होता और हरिण उसी को जल समझकर प्यास बुझाने के लिये दौड़ता है। उसी को “मृगतृष्णा’ कहते हैं)
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