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वैराग्य संदीपनी • अध्याय 1 • श्लोक 13
सत्रु न काहू करि गनै मित्र गनै नहिं काहि । तुलसी यह मत संत को बोलै समता माहि ॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि वह न तो किसी को शत्रु करके मानता है और न किसी को मित्र ही मानता है। संत का यही सिद्धान्त है कि वह समता में ही यानी सबको समान समझकर ही बोलता है।
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