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उपदेश सारम • अध्याय 1 • श्लोक 25
वेषहानतः स्वात्मदर्शनम् । ईशदर्शनं स्वात्मरूपतः ॥
आत्मा के सभी गुणों को नष्ट करके उसका साक्षात्कार करना ही ईश्वर-सत्य का साक्षात्कार है, क्योंकि वह ही आत्मा के रूप में प्रकाशित होता है।
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