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उपदेश सारम • अध्याय 1 • श्लोक 22
विग्रहेन्द्रियप्राणधीतमः । नाहमेकसत्तज्जडं ह्यसत् ॥
चूंकि मैं शुद्ध अस्तित्व हूं, इसलिए मैं शरीर नहीं हूं, इंद्रियां नहीं हूं, मन नहीं हूं, प्राण नहीं हूं, अज्ञान भी नहीं हूं, क्योंकि ये सभी चीजें बहुत ही असंवेदनशील और अवास्तविक हैं।
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