यही 'मैं' शब्द का शाश्वत वास्तविक अर्थ है। क्योंकि गहनतम निद्रा में हम रहना नहीं छोड़ते। यहां 'मैं' का कोई भाव न होने पर भी हमारा अस्तित्व है।
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