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उपदेश सारम • अध्याय 1 • श्लोक 20
अहमि नाशभाज्यहमहंतया । स्फुरति हृत्स्वयं परमपूर्णसत् ॥
यह खोज तब तक जारी रहती है जब तक कि 'मैं' गायब नहीं हो जाता, अब वहाँ 'मैं-मैं' ही कंपन करता है, खोज पूरी हो जाती है, अब और कुछ खोजने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि यही वास्तव में अनंत आत्मा है।
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