सभी शरीरों के अन्दर हृदय रूपी गुहा में यह शुद्ध आत्मा निवास करता है। शरीर तो मेद, मांस और रक्त से अभिपूरित है, जो अत्यन्त नश्वर और चित्रभित्ति (चित्रस्थ दीवार) के समान गन्धर्व नगर तुल्य, केले के गर्भ की तरह निस्सार, जल के बुलबुले की तरह चञ्चल है; किन्तु उससे परे रहने वाला आत्मा अचिन्त्यरूप, दिव्य, प्रकाशवान्, असङ्ग, शुद्ध, तेजः स्वरूप, अरूप, सर्वेश्वर, अचिन्त्य और अशरीर है। हृदय रूपी गुहा में निवास करने वाला वह (आत्मा) अमृत और देदीप्यमान है। विद्वान् उसको आनन्दरूप में देखते हैं और उसमें विलय हो जाने के पश्चात् उससे भिन्न कुछ भी नहीं देखते।
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