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सुबाल • अध्याय 6 • श्लोक 7
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भुतं यच्च भव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति । तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम् । तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते। विष्णोर्यत्परमं पदम् । तदेतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशास्त्रम् ॥
यह जो कुछ वर्तमान में है, जो पूर्व में हो चुका है और जो आगे भविष्य में होगा, वह सब पुरुष (परमेश्वर) ही है। इस अमर जीव-जगत् के भी वही स्वामी हैं। जो अन्न द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हैं, उनके भी वही स्वामी हैं। वही विष्णु का परम पद है, जिसे विद्वज्जन सदैव देखते हैं। यह अन्तरिक्ष में फैले हुए चक्षु के समान है। क्रोधित न होने वाले तथा सतत जाग्रत् रहने वाले विप्रगण इसका साक्षात्कार करते हैं, यही विष्णु का परम पद है। यही निर्वाण का उपदेश है, यही वेद का अनुशासन है। यही वेद की सीख है।
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