अथेमा दश दश नाड्यो भवन्ति । तासामेकैकस्या द्वासप्ततिर्दासप्ततिः शाखा नाडीसहस्राणि भवन्ति यस्मिन्त्रयमात्मा स्वपिति शब्दानां च करोत्यथ यद्वितीये स कोशे स्वपिति तदेमं च लोकं परं च लोकं पश्यति सर्वाञ्छब्दान्विजानाति स संप्रसाद इत्याचक्षते प्राणः शरीरं परिरक्षति हरितस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्य श्वेतस्य नाड्यो रुधिरस्य पूर्णाः ॥
इस हृदय की दस-दस अर्थात् सौ नाड़ियों होती हैं। इनमें से प्रत्येक की बहत्तर-बहत्तर हजार नाड़ी-शाखायें होती हैं। इस प्रकार हजारों नाड़ियाँ होती हैं, जिनमें यह आत्मा शयन करता है और शब्दों की क्रिया करता है। द्वितीय कोश में जब आत्मा शयन करता है, तब इह लोक और परलोक का दर्शन करता है, समस्त शब्दों को जानता है, उस स्थिति में इसे संप्रसाद कहते हैं। प्राण शरीर की रक्षा करता है। ये नाड़ियाँ हरित वर्ण, नीले, पीले, लाल और श्वेत वर्ण के रक्त से अभिपूरित हैं (अर्थात् वात, पित्तादि रसों से पूर्ण हैं)।
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