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सुबाल • अध्याय 4 • श्लोक 1
हृदयस्य मध्ये लोहितं मांसपिण्डं यस्मिंस्तद्दहरं पुण्डरीकं कुमुदमिवानेकधा विकसितं हृदयस्य दश छिद्राणि भवन्ति येषु प्राणाः प्रतिष्ठिताः ॥
हृदय के मध्यभाग में रक्त वर्ण के मांस पिण्ड के बीच वह सूक्ष्म आत्म-तत्त्व विद्यमान है। वह कुमुद (रात्रि में विकसित होने वाले कुमुद पुष्प) के समान वेतवर्ण वाला और अनेक प्रकार से विकसित हुआ है। हृदय में दस छिद्र होते हैं, जिनके अन्दर प्राण निवास करते हैं। (ऋषि स्थूल हृदय के मध्य में स्थित पिण्ड में आत्मतत्त्व के होने की बात कहते हैं। वर्तमान विज्ञान के अनुसार हृदय में स्थित पेसमेकर, के साथ इसकी संगति बैठती है। हृदय की धड़कन का मूल स्पंदन वहीं से उभरता है, जिसे जीव चेतना द्वारा उ‌द्भूत स्पंदन ही कहा जा सकता है। हृदय में १० छिद्रों की बात स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों संदभों में सिद्ध होती है। हृदय की धड़कन के साथ प्राण संचरित होते हैं, ५ प्राण एवं ५ उपप्राण कुल दस प्रकार के प्राणों का संचरण हृदय से होता है, यह सूक्ष्म व्याख्या हुई। स्थूल हृदय में भी १० छिद्र इस प्रकार पाये जाते हैं - दाहिने ऑरिकल में शरीर के ऊपरी भाग से आने वाले रक्त का छिद्र सुपीरियर वैनाकोवा तथा २. नीचे से आने वाले के लिए इन्फीरियर वैनाकोवा ३. दाहिने आरि० से दाहिने वेंट्रिक्स का छिद्र, ४. दमें वेंट्रिकल से फेफड़ों से रक्त जाने का मार्ग' ट्रॅक्स', ५, ६. बायें फेफड़े से बायें आरि० में प्रवेश के दो मार्ग; ७,८. दायें फेफड़े से रक्त प्रवेश के दो मार्ग, ९. बायें आरि० से बायें वेन्ट्रि में रक्त जाने का मार्ग एवं १०. बायें वेंट्रिकल से शरीर पोषण के लिए रक्त से भेजने का मार्ग।)
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