असद्वा इदमग्र आसीदजातमभूतमप्रतिष्ठितमशब्दमस्पर्शमरूपमरसमगन्धमव्ययम-महान्तमबृहन्तमजमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥
(द्वितीय खण्ड में विश्वोत्पत्ति के पूर्व की स्थिति सत्-असत् से परे कही गई है। यहाँ दूसरा मत प्रकट करते हुए अपि कहते हैं-)
अथवा प्रथम सृष्टि के पूर्व यह जगत् असत् (अस्तित्व में होते हुए भी अप्रकट या अव्यक्त) था। यह आत्मा उससे उत्तपन्न नहीं हुई है और न ही उसने इससे प्रतिष्ठा पायी है। वह आत्मा अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अरस, अगन्ध, अव्यय है, न महान् है, न विस्तार युक्त है, वह जन्म रहित (अजन्मा) है, ऐसा मानकर धीर पुरुष शोक नहीं करते।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
सुबाल के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।