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सुबाल • अध्याय 13 • श्लोक 1
बाल्येन तिष्ठासेद्वालस्वभावोऽसङ्गो निरवद्यो मौनेन पाण्डित्येन निस्वधिंकारतयोपलभ्येत कैवल्यमुक्तं निगमनं प्रजापतिरुवाच महत्पदं ज्ञात्वा वृक्षमूले वसेत कुचेलोऽसहाय एकाकी समाधिस्थ आत्मकाम आप्तकामो निष्कामो जीर्णकामो हस्तिनि सिंहे दंशे मशके नकुले सर्पराक्षसगन्धर्वे मृत्यो रूपाणि विदित्वा न बिभेति कुतश्चनेति वृक्षमिव तिष्ठासेच्छिद्यमानोऽपि न कुप्येत न कम्पेतोत्पलमिव तिष्ठासेच्छिद्यमानोऽपि न कुप्येत न कम्पेताकाशमिव तिष्ठासेच्छिद्यमानोऽपि न कुप्येत न कम्पेत सत्येन तिष्ठासेत्सत्योऽ यमात्मा ॥
(ज्ञानी के लिए) बाल्यकाल में ही सदैव बने रहने की कामना करना, बालकों जैसे स्वभाव वाला, असंग (आसक्ति रहित) रहना एवं निरवद्य (बिना दोष के) रहना, मौन रहना तथा पाण्डित्य को प्राप्त करना, अवधि रहित (वर्णाश्रम आदि से परे रहने वाले) अधिकार, को प्राप्त करना, यही अन्तिम कैवल्य स्थिति बतलायी गयी है। प्रजापति ने कहा कि श्रेष्ठ पद को जान लेने के बाद वृक्षों के नीचे निवास करना, जीर्ण वस्त्रों को धारण करना, किसी की भी सहायता न प्राप्त करना तथा एकाकी ही समाधि अवस्था में लीन रहना चाहिए। इस तरह से पुरुष आत्मा को प्राप्त करने की इच्छा वाला, पूर्णकाम एवं कामनाओं से रहित होता है। उस पुरुष की समस्त इच्छाएँ जीर्ण-शीर्ण हो जाती हैं। फिर वह पुरुष हाथी, सिंह, डाँस, मच्छर, न्यौला, सर्प, राक्षस या गन्धर्व आदि में मृत्यु का रूप समझकर किसी से भी भयभीत नहीं होता। वृक्ष की भाँति स्थिर रहने की कामना करता रहता है। उसे यदि कोई काटकर नष्ट कर दे, तब भी वह क्रोधरहित रहता है, कम्पायमान नहीं होता, कमल की तरह निर्लिप्त रहना चाहता है। अस्त्र-शस्त्रादि से छेदा भी जाये, तब भी क्रोधित न हो, अपनी जगह पर स्थिर रहकर आकाश की तरह से वह (निर्लिप्त) रहना चाहता है। छिन्न-भिन्न कर देने पर क्रोधित न हो, कंपित न हो, सदैव सत्य के प्रति आरूढ़ रहना चाहता है। यही आत्मा का सत्य रूप है।
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