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श्रीविद्यारत्नसूत्राणि • अध्याय 1 • श्लोक 52
तथैव प्रासादविशिष्टयोरुभयोः ॥
इसी प्रकार दोनों (रूपों) में प्रासादविशिष्टता होती है।
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