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शाण्डिल्य • अध्याय 2 • श्लोक 3
यस्मिन्निदमोतं च प्रोतं च। यस्मिन्निदं सं च विचैति सर्वं यस्मिन्विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति । तदपाणिपादमचक्षुः श्रोत्रमजिह्वमशरीरमग्राह्यमनिर्देश्यम् ॥
जिसमें यह सभी कुछ ओत-प्रोत है। जिसमें यह प्रादुर्भूत होता है तथा अस्त भी होता है, उसी तरह से जिसको समझ लेने से यह सभी कुछ समझ लिया जाता है, वह हाथ-पैर से विहीन, नेत्रों से रहित, कार्य विहीन, जिह्वा रहित, शरीर विहीन, स्वीकार न किये जाने योग्य तथा स्पष्ट रूप से बताये न जा सकने योग्य है।
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