स होवाचाथर्वा शाण्डिल्य सत्यं विज्ञानमनन्तं ब्रह्म ॥
तत्पश्चात् अथर्वा मुनि ने कहना प्रारम्भ किया - "हे शाण्डिल्य! ब्रह्म, सत्य, विज्ञान एवं अनन्त रूपों में संव्याप्त है।"
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