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शाण्डिल्य • अध्याय 2 • श्लोक 1
अथ ह शाण्डिल्यो ह वै ब्रह्मऋषिश्चतुषु वेदेषु ब्रह्मविद्यामलभमानः किं नामेत्यथर्वाणं भगवन्तमुपसन्त्रः पप्रच्छाधीहि भगवन् ब्रह्मविद्यां येन श्रेयोऽवाफ्यामीति ॥
तदनन्तर ब्रह्मर्षि शाण्डिल्य ने चारों वेदों में (चारों वेदों का अध्ययन करने पर भी) ब्रह्म विद्या को प्राप्त न कर पाने से भगवान् अथर्वा की शरण में पहुँचकर प्रश्न किया- 'हे भगवन्! आप हमें ब्रह्म विद्या का अध्ययन कराएँ, जिससे कि मुझे कल्याण की प्राप्ति हो।
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