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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 9
कवीनां संदर्भस्तबकमकरन्दैकरसिकं कटाक्षव्याक्षेपभ्रमरकलभौ कर्णयुगलम् । अमुञ्चन्तौ दृष्ट्वा तव नवरसास्वादतरला- वसूयासंसर्गादलिकनयनं किंचिदरुणम् ॥
कवियों की कविता रूपी स्तवक से उठने वाली सुगंध के रसिक कानों का माथ न छोडने वाले तेरे कटाक्ष विक्षेप युक्त, तिरछी निगाह से देखने वाले, भ्रमरों के सदृश और कविताओं के ९ रसों का आस्वाद लेने को बेचैन, चंचल दोनों नेत्रों को देख कर इर्ष्या के संसर्ग से तेरा (तीसरा) मस्तक वाला नेत्र कुछ लाल रंग युक्त है।
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