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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 8
विशाला कल्याणी स्फुटरुचिरयोध्या कुवलयैः कृपाधाराधारा किमपि मधुराभोगवतिका । अवन्ती दृष्टिस्ते बहुनगरविस्तारविजया ध्रुवं तत्तन्नामव्यवहरणयोग्या विजयते ॥
तेरी दृष्टि विशाला, कल्याणी खिले हुए कमलों की शोभा की उपमा से उंची अयोध्या, कृपा की धारा सदृश धारा, कुछ२ मधुरा, भोगवति का, सबकी रक्षा करने वाली अवन्तिका और अनेक नगरों के विस्तार को जीतने वाली विजया है और निश्चय से इन प्रत्येक नगरियों के नाम से संबोधित नाना अर्थो के संदेह को हरण करने के योग्य है। अर्थात् प्रत्येक के नाम की भाव सूचक है।
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