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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 62
प्रदीपज्वालाभिर्दिवसकरनीराजनविधिः सुधासूतेश्चन्द्रोपलजललवैरर्घ्यरचना । स्वकीयैरम्भोभिः सलिलनिधिसौहित्यकरणं त्वदीयाभिर्वाग्भिस्तव जननि वाचां स्तुतिरियम् ॥
हे जननि! तेरी प्रदान की हुई वाक्शक्ति से की गई इस स्तुति के शब्द इस प्रकार हैं जैसे दीपक की ज्वालाओं से सूर्य की आरती उतारना, अथवा चन्द्रकान्त मणि से टपकते हुए जलकणों से चन्द्रमा को अर्ध्य प्रदान करना अथवा समुद्र का सत्कार उस ही के जल से करना।
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