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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 61
निधे नित्यस्मेरे निरवधिगुणे नीतिनिपुणे निराघातज्ञाने नियमपरचित्तैकनिलये । नियत्या निर्मुक्ते निखिलनिगमान्तस्तुतिपदे निरातङ्के नित्ये निगमय ममापि स्तुतिमिमाम् ॥
हे सदा हंसमुखि असीमगुणनिधे, नीतिनिपुणे, निरतिशयज्ञानवति, नियम परायण भक्तों के चित्त में घर करने वाली, नियति से निर्मुक्त अर्थात् नियति से अतीते, सब शास्त्र उपनिषद् जिसके पद की स्तुति करते हैं ऐसी अभये, सनातनी नित्ये! मेरी भी इस स्तुति को स्वीकार करके अपने निगमों में स्थान दो।
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