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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 60
सरस्वत्या लक्ष्म्या विधिहरिसपत्नो विहरते रतेः पातिव्रत्यं शिथिलयति रम्येण वपुषा । चिरं जीवन्नेव क्षपितपशुपाशव्यतिकरः परानन्दाभिख्यम् रसयति रसं त्वद्भजनवान् ॥
तेरा भजन करने वाला मनुष्य सरस्वती और लक्ष्मी दोनों से युक्त होकर ब्रह्मा और हरि के सापत्नडाह का पात्र बनकर विहार करता है। और सुन्दर रम्य शरीर से रति ( कामदेव की स्त्री ) के भी पातिव्रत धर्म को शिथिल करता है, अर्थात् वह विद्वान्, धनाड्य और सुन्दर रूपलावण्य युक्त शरीर वाला हो जाता है। और पशु पाश के दु:खों को नष्ट करके चिरकाल तक परमानन्द के रस का रसास्वाद लेता हुआ जीवित रहता है।
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