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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 6
भ्रुवौ भुग्ने किंचिद्भुवनभयभङ्गव्यसनिनि त्वदीये नेत्राभ्यां मधुकररुचिभ्यां धृतगुणम् । धनुर्मन्ये सव्येतरकरगृहीतं रतिपतेः प्रकोष्ठे मुष्टौ च स्थगयति निगूढान्तरमुमे ॥
(भृकुटि का ध्यान) हे भुवन के भय का नाश करने में आनन्द लेने वाली उमे ! भ्रुवों की त्योरी चढ़ने पर मैं उसकी बायें हाथ में लिये हुए कामदेव के धनुष से उपमा देता हूं, जिसकी प्रत्यंचा भौंरौं की कांति वाले तेरे दोनों नेत्रों की बनी है और जिसका मध्य भाग मुट्ठी के और कलाई के नीचे छुपा हुआ है।
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