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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 59
कदा काले मातः कथय कलितालक्तकरसं पिबेयं विद्यार्थी तव चरणनिर्णेजनजलम् । प्रकृत्या मूकानामपि च कविताकारणतया कदा धत्ते वाणीमुखकमलताम्बूलरसताम् ॥
हे मां! बताओ, वह समय कब आयेगा, जब मैं एक विद्यार्थी, तेरे चरणों का धुला हुआ जल (चरणोदक), जो लाक्षारस (महावर) के रंग से लाल हो रहा है, पान करूंगा, जिसमें सरस्वती के मुखकमल से निकले हुए पान की पीक के सदृश, जन्म के गूंगे को भी कविता शक्ति प्रदान करने की क्षमता है।
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