मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 58
समुद्भूतस्थूलस्तनभरमुरश्चारु हसितं कटाक्षे कन्दर्पः कतिचन कदम्बद्युति वपुः । हरस्य त्वद्भ्रान्तिं मनसि जनयन्ति स्म विमलाः भवत्या ये भक्ताः परिणतिरमीषामियमुमे ॥
(घटा अवस्था) हे उमे! ऊपर उभरे हुए स्थूल स्तनों के भार से युक्त उरु:स्थल, सुन्दर हंसी और कटाक्ष में कंदर्प और कदंब वृक्ष की कुछ शोभा वाला शरीर, सब हर के मन में तरी याद दिलाकर भ्रम उत्पन्न करते हैं, क्योंकि तेरे विमल भक्तों में तेरी तद्रूपता की परिणति के कारण वे तेरे जैसे दिखने लगते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
सौन्दर्यलहरी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

सौन्दर्यलहरी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें