मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 56
कलत्रं वैधात्रं कतिकति भजन्ते न कवयः श्रियो देव्याः को वा न भवति पतिः कैरपि धनैः । महादेवं हित्वा तव सति सतीनामचरमे कुचाभ्यामासङ्गः कुरवकतरोरप्यसुलभः ॥
विधाता की स्त्री सरस्वती को क्या कितने ही कविजन नही भजते? और कौन थोडा सा भी धनवान होकर लक्ष्मी का पति नहीं होता? (धनाड्य को धनपति या लक्ष्मि पति कहने लगते हैं)। परन्तु हे सति सतियों में श्रेष्ट! महादेव को छोड़कर तेरे कुचों का संग तो कुरवक तरू को भी दुर्लभ है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
सौन्दर्यलहरी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

सौन्दर्यलहरी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें