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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 55
पुरारातेरन्तःपुरमसि ततस्त्वच्चरणयोः सपर्यामर्यादा तरलकरणानामसुलभा । तथा ह्येते नीताः शतमखमुखाः सिद्धिमतुलां तव द्वारोपान्तस्थितिभिरणिमाद्याभिरमराः ॥
(भगवती की सपर्या की असुलभता) तू त्रिपुरारि के अन्त:पुर की रानी है इसलिये तेरे चरणों की सपर्या पूजा की मर्यादा चंचल इंद्रियों वाले मनुष्यों को सुलभ नहीं और इन्द्र की प्रमुखता में रहने वाले ये देवगण तेरे द्वार के निकट खडी रहने वाली अणिमादि की अतुल सिद्धियों तक ही पहुंच पाते हैं।
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