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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 53
समानीतः पद्भ्यां मणिमुकुरतामम्बरमणि- र्भयादास्यादन्तःस्तिमितकिरणश्रेणिमसृणः । दधाति त्वद्वक्त्रंप्रतिफलनमश्रान्तविकचं निरातङ्कं चन्द्रान्निजहृदयपङ्केरुहमिव ॥
(भगवती के शृङ्गारर्थ दर्पण का ध्यान) अंबर मणि अर्थात् सूर्य तेरे चरणों के समीप होने पर मुकुर (दर्पण) का काम दे रहा है । तेरे मुख के भय से उसने अपनी किरणों के समूह को अन्दर छुपा लिया है, इसलिये वह स्वच्छ है और तेरे मुख का प्रतिबिंब उसके हृदय कमल के सदृश सदा विकसित है (क्योंकि तेरा मुख कमल सदा विकसित रहता है और वह उसका प्रतिबिंब है) और उसको चन्द्रमा का भय नहीं है। (कमल सूर्य को देख कर खिलता है और रात्रि में मुरझा जाता है मानों उसे चन्द्रमा से भय लगता है)।
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