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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 52
अराला केशेषु प्रकृतिसरला मन्दहसिते शिरीषाभा चित्ते दृषदुपलशोभा कुचतटे । भृशं तन्वी मध्ये पृथुरुरसिजारोहविषये जगत्त्रातुं शम्भोर्जयति करुणा काचिदरुणा ॥
शंभु की करुणा (अर्थात् दया) की, जगत की रक्षा करने के लिये मानों जो कदाचित अरुणा है सर्वत्र जय हो रही है। जिसके अर्थात् अरुणा भगवती के केश स्वाभाविक सरलता लिये हुए घूंघराले अर्थात् कुटिल हैं, मन्द २ हंसी मुख पर है, गात्र अथवा चित्त सिरस की आभा लिये हुए है, कुच पत्थर सदृश कठोर है (अथवा स्फटिक की शोभा युक्त हैं) मध्य में कटिभाग अति पतला है और नितंब भारी हैं (अथवा कुचों का उठाव भारी है) पाटान्तर को ग्रहण करने में शरीर के स्थान पर चित्त और नितंब के स्थान पर कुचों का दुबारा वर्णन हो जाता है। चित्त को स्फटिक में उपमित तो किया जा सकता है, परन्तु देह’ की शोभा का वर्णन किया जाना अधिक उपयुक्त दिखता है और कुचों को दोबारा न बताकर नितंबों का भी वर्णन आना अत्यावश्यक है, इसलिए हमने पाठान्तरों को पृथक दिखा दिया है।
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