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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 51
गतास्ते मञ्चत्वं द्रुहिणहरिरुद्रेश्वरभृतः शिवः स्वच्छच्छायाघटितकपटप्रच्छदपटः । त्वदीयानां भासां प्रतिफलनरागारुणतया शरीरी श‍ृङ्गारो रस इव दृशां दोग्धि कुतुकम् ॥
(पलंग का ध्यान) ब्रह्मा हरि रुद्र और ईश्वर द्वारा रक्षा किये जाने वाले ( क्रमश: मूलाधार, स्वाधिष्टान, मणिपूर और अनाहत् चक्र ) तेरे मंच के चार पाये हैं, अर्थात् चारों तेरा मंच बनाते हैं उस पर बिछी हुई स्वच्छ छाया की बनी हुई कपट रुपी माया की चादर शिव है, जो तेरी प्रभा के झलकने के कारण अरुण दिख पड़ने से एसी प्रतीत होती है कि मानो शृङ्गार रस शरीरी बनकर दृष्टि में कुतूहल उत्पन्न कर रहा है।
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