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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 50
पदन्यासक्रीडापरिचयमिवारब्धुमनसः स्खलन्तस्ते खेलं भवनकलहंसा न जहति । अतस्तेषां शिक्षां सुभगमणिमञ्जीररणित- च्छलादाचक्षाणं चरणकमलं चारुचरिते ॥
(चरणों की गति का ध्यान) हे चारु चरिते! ऐसा प्रतीत होता है कि तेरे भवन के राजहंस चलते समय तेरे पदन्यास क्रीडा (चाल) का परिचय प्राप्त करने को तेरे खेल का त्याग नहीं करते । (अर्थात् तेरे पीछे २ तेरी तरह कदम उठाकर चलते हैं, और वे इस खेल का त्याग नहीं करते) और तेरे चलते समय चरण कमलों में लगी मणियों युक्त नूपुरों की झङ्कार का शब्द मानो उनको चलने की शिक्षा का उपदेश कर रहा है।
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