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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 5
ललाटं लावण्यद्युतिविमलमाभाति तव य- द्द्वितीयं तन्मन्ये मकुटघटितं चन्द्रशकलम् । विपर्यासन्यासादुभयमपि संभूय च मिथः सुधालेपस्यूतिः परिणमति राकाहिमकरः ॥
(ललाट का ध्यान) लावण्य कांति से युक्त विमल चमकने वाला जो तेरा ललाट है, उसे मैं मुकुट में जडी हुई चन्द्रमा की दूसरी कला समझता हूं, जो एक दूसरे पर उलट कर रखी होने के कारण दोनों का एक रूप बनकर और अमृत के लेप में जुड कर पूर्ण चन्द्रमा बन गया है।
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