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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 48
नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसंकोचशशिभि- स्तरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ । फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलयकराग्रेण ददतां दरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमह्नाय ददतौ ॥
हे चण्डि! तेरे दोना चरण अपने नखों ने कल्पवृक्षों का परिहास सा कर रहे हैं, जो नख देवांगनाओं के कर रूपी कमलों को (हाथ जोड़ते समय) बंद करने के लिये संख्या में १० चन्द्रमा सदृश हैं। कल्पवृक्ष तो स्वर्ग में रहने वाले स्वावलंबी देवताओं को अपने पल्लव रूपी कराग्रों से फल देते हैं, परन्तु तेरे चरण दरिद्रियों को निरन्तर, तुरन्त और बहुत धन देते रहते हैं।
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