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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 45
मृषा कृत्वा गोत्रस्खलनमथ वैलक्ष्यनमितं ललाटे भर्तारं चरणकमले ताडयति ते । चिरादन्तःशल्यं दहनकृतमुन्मूलितवता तुलाकोटिक्वाणैः किलिकिलितमीशानरिपुणा ॥
तेरे गोत्र का अपमान करने से लज्जित नीचे नेत्र किये हुए भर्तार के ललाट पर तेरे चरण कमलों का ताड़न होने पर इशानरिपु (कामदेव ) ने जिसको चिरकाल से जलाया जाने के कारण अन्तर्दाह था उसे निकालते हुए अपना बदला देखकर, तरे नूपुरों के बजने के कणत्कार की किलकिलाहट रूपी हर्ष ध्वनि की।
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