हम तेरे इन दोनों चरणों को प्रणाम करते हैं, जो नयनों को रमणीय हैं और जिन पर लाक्षा की तीव्र कान्ति चमक रही है। जिनके अभिहनन की स्पृहा से पशुपति तेरे प्रमदावन के अशोक वृक्ष से अनन्य असूया रखते हैं।
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