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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 44
नमोवाकं ब्रूमो नयनरमणीयाय पदयो- स्तवास्मै द्वन्द्वाय स्फुटरुचिरसालक्तकवते । असूयत्यत्यन्तं यदभिहननाय स्पृहयते पशूनामीशानः प्रमदवनकङ्केलितरवे ॥
हम तेरे इन दोनों चरणों को प्रणाम करते हैं, जो नयनों को रमणीय हैं और जिन पर लाक्षा की तीव्र कान्ति चमक रही है। जिनके अभिहनन की स्पृहा से पशुपति तेरे प्रमदावन के अशोक वृक्ष से अनन्य असूया रखते हैं।
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